दादा का सुनहरा सफ़रनामा
लॉर्डस के मैदान में टी-शर्ट उतारकर जीत का इज़हार करने वाला वो दृश्य किस क्रिकेट प्रेमी को याद नहीं होगा। शायद यही एक पल था जो भारतीय क्रिकेट के कायापलट की दास्तां को बयां कर रहा था। टी-शर्ट उतारकर हवा में लहराने वाला शख्स और कोई नहीं बल्कि उस समय भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान सौरव गांगुली थे। अगर यह कहा जाए कि दादा (सौरव गांगुली) के कैरियर का यह सबसे सुनहरा दौर था तो अतिश्योक्ति न होगा। हमेंशा सचिन के सहारे चलने वाली भारतीय टीम में अगर कभी युवा जोश और नईं उमंगों का प्रसार हुआ तो वो भी सौरव गांगुली की कप्तानी में ही। कप्तान के रुप में युवा जोश को जितनी तव्वजो़ सौरव गांगुली ने दी शायद ही किसी और भारतीय कप्तान ने कभी दी थी।एक तो युवा खिलाड़ियों की ब्रिगेड और उस पर बंगाल टाईगर का जोशीला अंदाज़,कप्तान के रुप में साउथ अफ्रिका के खिलाफ पहले ही वन-डे सीरीज में 3-2 से कब्जा़ करके सौरव ने दिखा दिया कि भारतीय क्रिकेट टीम में कितना दम-खम है। ये तो गांगुली की कप्तानी की बस शुरुआत भर थी।8 जुलाई 1972 को बंगाल में जन्में सौरव चण्डिदास गांगुली ने अपने अंतर्राष्ट्रीय वन-डे क्रिकेट कैरियर की शुरुआत 1992 में वेस्ट्इंडीज के विरुद्ध की। हालांकि वन-डे टीम में दोबारा जगह बनाने के लिये उन्हें लम्बा इंतजार पडा़। बांये हाथ के इस बल्लेबाज ने अपने टेस्ट कैरियर की शुरुआत धमाकेदार ढंग से की। 1996 में इंग्लैड के विरुद्द अपने पहले ही टेस्ट में सैकड़ा जड़ कर दादा ने दुनियां को जता दिया कि भारतीय क्रिकेट का भविष्य सुनहरे हाथों में है। टेस्ट क्रिकेट में अच्छे प्रदर्शन का असर उनके वन-डे कैरियर पर भी पड़ा और 1997 में गांगुली ने अपना पहला वन-डे शतक बनाया। गांगुली का अच्छा प्रदर्शन जारी रहा, लेकिन कई ऐसे दौर भी आये जब गांगुली अपनी ख़राब फार्म से जुझते दिखे। हर बार गांगुली ने अपनी गलतियों से सीख ली और प्रदर्शन के बल पर भारतीय टीम में वापसी भी की।याद कीजिये 1999 का वर्ल्ड कप और भारत-श्रीलंका का रोमांचक मैच, श्रीलंका के बॉलिंग अटैक की जो शख्स धज्जियां उड़ा रहा था, वो सौरव गांगुली ही था। इस मैच में गांगुली ने 183 रन की पारी खेली, जो उनके वन-डे कैरियर का सर्वाधिक स्कोर भी है। सन् 2000 में केन्या में हुई नॉक आउट सीरिज में कप्तानी के दम पर गांगुली ने भारतीय टीम को फाईनल तक पहुंचाया।और तीन शतक के बल पर उन्हें मैन ऑफ द सीरीज़ घोषित किया गया। वर्ष 2002 भारतीय क्रिकेट और दादा की कप्तानी के लिये सुनहरा दौर रहा। श्रीलंका में हुई चैम्पियंस् ट्रॉफी में सौरव की युवा टीम का प्रदर्शन सराहनीय रहा। भारत फाईनल में पंहुचा, लेकिन ये भारत की बदकिस्मती ही थी कि मौसम ने साथ नहीं दिया और भारत और श्रीलंका को संयुक्त विजेता घोषित किया गया। सौरव की ही कप्तानी में 2002 में भारत,आस्ट्रेलिया की ज़मीं पर सीरीज़ ड्रा कराने में सफल रहा।सौरव की ही कप्तानी में 2004 में भारत ने पाकिस्तान का दौरा किया और टेस्ट सीरीज में पाकिस्तान को 2-1 से उसी की सरज़मीं पर पटखनी देने में का़मयाब रहा। सौरव को भारतीय टेस्ट क्रिकेट टीम का अब तक का सबसे सफलतम कप्तान माना जाता है। सौरव की कप्तानी में खेले गये 49 टेस्ट मैचों मे से भारत ने 21 मैचों में जीत हासिल की,15 मैच ड्रा रहे जबकि 13 मैच हारे भी। वन डे मैचों में भी सौरव की कप्तानी के दौरान भारतीय टीम की जीत का प्रतिशत 53.52 रहा। कोच जॉन राइट और दादा के नेत्रत्व में भारत के प्रदर्शन में सुधार हुआ। जॉन रा्इट का कार्यकाल समाप्त होने के बाद, कोच के रुप में ग्रेग चैपल ने भारतीय टीम की कमान संभाली। चैपल ने नये और हाईटेक तक़नीक का इस्तेमाल भारतीय टीम को प्रशिक्षित करने में किया। ग्रेग चैपल की युवा जोश को तव्वजो़ देने की नीति भारतीय सीनियर्स पर भारी पड़ने लगी। और फिर आया वो विवाद जिसने भारतीय टीम को दो खे़मों में बांट दिया। मामला था ग्रेग चैपल द्वारा बीसीसीआई को भेजे गये ई-मेल के लीक होने का। ई-मेल में चैपल ने सीनियर्स के रवैये पर सवाल उटाये थे खा़सकर सौरव के रवैये पर। इस ई-मेल के कारण कोच और कप्तान के रिश्तों में खटास पैदा हुई जिसका असर आने वालों दिनों में नज़र आया। दादा को कप्तानी से हाथ धोना पड़ा, टेस्ट क्रिकेट में अच्छे प्रद्रर्शन के बावजू़द सौरव टीम से निकाल दिये गये। क्या टीम से निकाले जाने का कारण उनका ख़राब प्रदर्शन था?साफ़ नज़र आ रहा था कि दादा नइंसाफी के बुरे दौर से गुज़र रहे थे। शायद ये चयनकर्ताओं की निजी़ गुस्से का नतीज़ा भी था। कारण जो भी रहे हों, लेकिन बहाना एक ही “उम्र का तकाज़ा”। अगर उम्र की ही बात की जाये तो उम्रदराज़ खिलाड़ियों में भी दादा का प्रदर्शन बेहतर था। लेकिन “टाइगर” हार कहां मानने वाला था। भारतीय टीम में न होते हुए भी दादा लगातार घरेलू क्रिकेट में खेलते हुए नज़र आते रहे। जल्दी ही दादा ने वन-डे टीम में कमबैक किया और पहले ही मैच में 98 रन की पारी खे़ल कर गांगुली ने आलोचकों के मुंह पर ताले ज़ड़ दिये। मानो ये बंगाल टाईगर की दहाड़ थी। इसके बाद दादा की टेस्ट टीम में वापसी भी धमाकेदार रही।लेकिन सौरव गांगुली के ऊपर हमेंशा सेलेक्टरों की तलवार लटकी रही। आज भी सौरव पिछले एक साल से वन-डे टीम से बाहर हैं। दूसरी ओर भारतीय टीम के पू्र्व मुख्य सेलेक्टर वेंगसकर ने जाते-जाते भी दादा पर अपना गुस्सा निकाल ही दिया और दादा को ईरानी ट्राफी से भी बाहर कर दिया। लेकिन गांगुली ने हर बार सेलेक्टरस् को घुटने टेकने पर मज़बूर किया। नई कमेटी ने दादा को मौका तो दिया लेकिन यह भी महसूस करा दिया कि शायद ये उनके लिये आख़री मौका होगा। इस बार टाइगर घुटने टेकता दिख़ रहा था। मसला था स्वाभिमान का और सम्मान का। और फिर दादा का क्रिकेट से संन्यास लेने के ऐलान ने दादा के समर्थकों को निराश तो कर ही दिया। गांगुली को हर बार टीम से निकाले जाने का कारण जो भी रहा हो लेकिन हर बार गांगुली ने अपने “प्रदर्शन” के बदौलत ही टीम में जगह बनायी है।इस आस्ट्रेलिया-इंडिया सीरीज़ के बाद सौरव संन्यास ले लेगें और ये होगा दादा के सुनहरे क्रिकेट कैरियर का दुखद अंत। गुड लक “दादा”…..
Posted by nitin pandey at 4:41 AM 0 comments
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Wednesday, October 22, 2008
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