जिंदगी जीने के दो ही तरीके हैं- एक तो जो हो रहा है उसे होने दो...सहते जाओ!
और दूसरा- आवाज उठाओ और दुनिया को बदलो!
रंग दे बसंती फिल्म में आमिर खान के इस डायलॉग ने युवाओं को अन्याय के ख़िलाफ सोचने पर मजबूर कर दिया था। इस फिल्म के बाद युवाओं पर क्या-क्या असर हुआ ये हम सब ने देखा। चाहे वो आरक्षण के खिलाफ युवाओं का अभियान हो या फिर कुछ और। अपनी मिट्टी के लोगों के प्रति हो रहे अन्याय को शायद राहुल राज भी नहीं सहन कर पाया था। तभी तो अपने ही उपनाम ‘राज’ से वो नफरत करने लगा था। वो भी अपनी आवाज उपर तक ही पहुँचाने निकला था। हाथों में तमंचा लिए उसका मकसद वो नहीं था, जो मनसे के कार्यकर्ताओं का हाथों में डंडे लिए होता है। उसने इस तमंचे से तो किसी को नुकसान भी नहीं पहुँचाया था, जबकि डंडों ने तो एक उत्तर भारतीय की जान तक ले ली थी। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने निकले इस युवा के साथ ही अन्याय हो गया। दिवाली के एक दिन पहले बुझ गया राहुल के जिंदगी का दीया। अंत वही... जो “रंग दे बसंती” के पांच सूरमाओं का हुआ। शायद उसे नहीं पता था कि इस देश में जिंदगी पहले तरीके से ही जी जाती है।
:-नितिन पाण्डेय
Sunday, November 2, 2008
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